वसुंधरा ताल में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, 344 ग्लेशियल झीलों की निगरानी को मिलेगी तकनीकी मजबूती

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Vasundhara Tal to Get Early Warning System for GLOF Risk Monitoring

वसुंधरा ताल में स्थापित होगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, ग्लेशियल झीलों की निगरानी को मिलेगी तकनीकी मजबूती

 

Uttarakhand begins installing an early warning system at Vasundhara Tal to monitor GLOF risks, glacial lake changes and high Himalayan conditions.

 

 

देहरादून। उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के जोखिम को कम करने और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल शुरू हो गई है। चमोली जनपद स्थित वसुंधरा ताल से प्रदेश में ग्लेशियल झीलों के लिए आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की शुरुआत की जा रही है।

मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने मंगलवार को सचिवालय से वसुंधरा ताल में निगरानी एवं पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए रवाना हो रहे वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने अभियान में शामिल विशेषज्ञों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पहल भविष्य में ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिमों को समझने, उनकी निगरानी करने और संभावित GLOF घटनाओं के प्रभाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी।

मुख्य सचिव ने कहा कि अत्याधुनिक सेंसर, उपग्रह संचार और रियल-टाइम डेटा मॉनिटरिंग के माध्यम से ग्लेशियल झीलों में होने वाले जलस्तर, मौसम, हिम और जल प्रवाह संबंधी परिवर्तनों को लगातार समझने में मदद मिलेगी। इससे संभावित असामान्य परिस्थितियों की पहचान कर समय रहते संबंधित तंत्र को अलर्ट उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी।

29 सितंबर से 15 अक्टूबर तक चलेगा अभियान

वसुंधरा ताल में निगरानी एवं पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए यह पहला वैज्ञानिक दल उच्च हिमालयी क्षेत्र में भेजा गया है। अभियान 29 सितंबर से 15 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी अभियान में शामिल वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों और सुरक्षा बलों को शुभकामनाएं दीं। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की निगरानी और उनसे जुड़े संभावित जोखिमों के प्रति सतर्कता अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम की स्थापना राज्य की आपदा तैयारियों को वैज्ञानिक एवं तकनीकी दृष्टि से मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। राज्य सरकार का प्रयास है कि वैज्ञानिक संस्थानों, विशेषज्ञों और आपदा प्रबंधन से जुड़े विभागों के समन्वय से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आधुनिक निगरानी एवं पूर्व चेतावनी तंत्र को लगातार मजबूत किया जाए।

CBRI और वाडिया संस्थान के विशेषज्ञ करेंगे स्थापना

यह अभियान उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) द्वारा राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित किया जा रहा है।

अभियान दल में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक एवं तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र की दुर्गमता को देखते हुए अभियान दल की सुरक्षा, आवागमन और फील्ड सपोर्ट के लिए SDRF, NDRF और ITBP के जवान भी साथ रहेंगे।

USDMA द्वारा अभियान के लिए आवश्यक समन्वय और लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। संचार व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए टीम को सैटेलाइट फोन और लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) डिवाइस भी उपलब्ध कराए गए हैं, ताकि मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में भी टीम का संपर्क एवं डेटा संचार बना रहे।

इन उपकरणों से होगी वसुंधरा ताल की निगरानी

वसुंधरा ताल में स्थापित किए जाने वाले अर्ली वार्निंग सिस्टम के तहत विभिन्न सेंसर और तकनीकी उपकरण लगाए जाएंगे। इनमें शामिल हैं—

  • जलस्तर सेंसर: झील के जलस्तर में उतार-चढ़ाव और असामान्य बदलावों की निगरानी।
  • स्वचालित मौसम केंद्र: तापमान, आर्द्रता, वर्षा, हवा की गति एवं दिशा, वायुदाब और प्रकाश की तीव्रता का मापन।
  • स्नो डेप्थ सेंसर: झील के आसपास बर्फ की गहराई में होने वाले बदलावों की निगरानी।
  • स्नो सब-सर्फेस टेंपरेचर सेंसर: बर्फ की विभिन्न गहराइयों पर तापमान में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए आठ सेंसर।
  • टिल्ट एवं एक्सेलेरोमीटर सेंसर: चयनित स्थानों पर झुकाव, कंपन और हलचल की निगरानी।
  • जल प्रवाह सेंसर: जल प्रवाह में होने वाले बदलावों की निगरानी।
  • सौर ऊर्जा प्रणाली: दुर्गम उच्च हिमालयी क्षेत्र में उपकरणों को विद्युत आपूर्ति।
  • उपग्रह संचार प्रणाली: मोबाइल नेटवर्क नहीं होने पर आंकड़ों को बेस स्टेशन तक पहुंचाने की व्यवस्था।
  • डेटा लॉगर एवं मॉनिटरिंग डैशबोर्ड: सेंसर से प्राप्त आंकड़ों का रिकॉर्ड, ऑनलाइन प्रदर्शन और निर्धारित थ्रेशोल्ड के आधार पर अलर्ट जनरेशन।

 

तकनीकी आंकड़ों से होगा जोखिम का आकलन

अर्ली वार्निंग सिस्टम के माध्यम से वसुंधरा ताल और उसके आसपास के पर्यावरणीय एवं जलवैज्ञानिक परिवर्तनों की लगातार निगरानी की जा सकेगी। सेंसर से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण कर संभावित असामान्य परिस्थितियों की पहचान में मदद मिलेगी।

मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने कहा कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी और आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणालियों की स्थापना से राज्य की आपदा पूर्व तैयारी और मजबूत होगी। वसुंधरा ताल में शुरू की जा रही यह व्यवस्था भविष्य में अन्य संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में भी इसी तरह के सिस्टम स्थापित करने का आधार तैयार कर सकती है।

ग्लेशियल झीलों की निगरानी प्राथमिकता: मदन कौशिक

आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी को मजबूत करना राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। वसुंधरा ताल से अर्ली वार्निंग सिस्टम की शुरुआत ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिमों की निगरानी की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

उन्होंने कहा कि प्रणाली के माध्यम से जलस्तर, मौसम, हिम की स्थिति, जल प्रवाह और अन्य महत्वपूर्ण मानकों से संबंधित आंकड़े लगातार प्राप्त किए जा सकेंगे। आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विशेषज्ञता के उपयोग से आपदा जोखिम को कम करने तथा उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।

उत्तराखंड में 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित

सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन के अनुसार, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) के वर्ष 2023 के आंकड़ों के आधार पर उत्तराखंड में कुल 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित की गई हैं।

इनमें से 13 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित किया गया है। इनमें बागेश्वर की एक, चमोली की चार, पिथौरागढ़ की छह, टिहरी गढ़वाल की एक और उत्तरकाशी की एक झील शामिल है।

उन्होंने बताया कि उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक एवं तकनीकी जांच के तहत अब तक छह झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है। इनमें चमोली की सरस्वती ताल और वसुंधरा ताल, उत्तरकाशी की केदारताल तथा पिथौरागढ़ की दारमा घाटी स्थित मबांग, प्यूनग्रू और स्युंक्ति यांक्ति प्रोग्लेशियल झीलें शामिल हैं।

बाथीमेट्रिक सर्वे के माध्यम से झीलों की गहराई, जलधारण क्षमता और अन्य महत्वपूर्ण जलवैज्ञानिक आंकड़े जुटाए गए हैं। इन आंकड़ों के आधार पर संभावित GLOF जोखिम का वैज्ञानिक आकलन करने और आवश्यक आपदा प्रबंधन तैयारियों को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

बस्तियों और महत्वपूर्ण अवस्थापना की सुरक्षा पर जोर

विनोद कुमार सुमन ने कहा कि ग्लेशियल झीलों में संभावित GLOF घटनाओं से निचले क्षेत्रों में स्थित बस्तियों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण अवस्थापना को जोखिम हो सकता है। ऐसे में वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर जोखिम की पहचान, नियमित निगरानी और समयबद्ध चेतावनी व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है।

राज्य सरकार का उद्देश्य उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की स्थिति पर लगातार नजर रखते हुए संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों में समय रहते आवश्यक सुरक्षा, राहत एवं बचाव की कार्रवाई सुनिश्चित करना है।