विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से मजबूत होगा आपदा प्रबंधन: ले. कर्नल भण्डारी

0
6

मानसून पूर्व तैयारियों पर राष्ट्रीय कार्यशाला शुरू, अर्ली वार्निंग सिस्टम और नो सेल्फी जोन पर जोर

विज्ञान के साथ पारंपरिक ज्ञान का समावेश आपदा प्रबंधन की कुंजी : ले. कर्नल भण्डारी

मानसून पूर्व तैयारियों पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ

यूएसडीएमए और एनआईडीएम के संयुक्त आयोजन में आपदा जोखिम न्यूनीकरण, अर्ली वार्निंग सिस्टम, बाढ़ प्रबंधन और तकनीकी नवाचारों पर हुआ मंथन

देहरादून। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम), गृह मंत्रालय, भारत सरकार एवं उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) के संयुक्त तत्वावधान में मानसून पूर्व तैयारियों को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का गुरुवार को यूएसडीएमए मुख्यालय में शुभारंभ हुआ। प्रशिक्षण कार्यक्रम में विभिन्न विभागों, जिला प्रशासन, आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों, तकनीकी विशेषज्ञों तथा सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधियों ने प्रतिभाग किया।

कार्यक्रम का उद्घाटन राज्य आपदा प्रबंधन सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष लेफ्टिनेंट कर्नल रघुवीर सिंह भण्डारी (सेवानिवृत्त) ने किया। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन केवल सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक को इसके प्रति जागरूक और प्रशिक्षित बनाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी आपदा की स्थिति में आम नागरिक ही सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वाला व्यक्ति होता है, इसलिए समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन को और अधिक मजबूत करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों और नवीन प्रौद्योगिकियों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण और उपयोग भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने वर्षों के अनुभव से मौसम, भू-संरचना, जल स्रोतों और प्राकृतिक संकेतों को समझने की विशिष्ट क्षमता विकसित की है, जो संभावित आपदाओं का पूर्वानुमान लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

ले. कर्नल भण्डारी ने ग्राम स्तर पर आपदा जोखिम न्यूनीकरण गतिविधियों को सशक्त बनाने पर जोर देते हुए कहा कि ग्राम प्रधानों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, स्वयं सहायता समूहों, युवक मंगल दलों, महिला मंगल दलों तथा स्वयंसेवी संगठनों को आपदा प्रबंधन प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए। स्थानीय नेतृत्व की भागीदारी से आपदा के दौरान त्वरित, प्रभावी और समन्वित प्रतिक्रिया सुनिश्चित की जा सकती है।

उन्होंने अपने सैन्य अनुभव साझा करते हुए कहा कि उत्तराखण्ड एक सैन्य बाहुल्य राज्य है, जहां बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक निवास करते हैं। संकट की परिस्थितियों में कार्य करने का उनका अनुभव, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और संसाधन प्रबंधन कौशल आपदा प्रबंधन व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बना सकता है।

विभागीय समन्वय से मजबूत होगी आपदा प्रबंधन प्रणाली

सचिव, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने कहा कि प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना तथा अधिकारियों को आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम विकास, तकनीकी नवाचारों और सर्वोत्तम प्रथाओं से अवगत कराना है।

उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन एक बहु-विभागीय विषय है, इसलिए सभी विभागों के बीच स्पष्ट संवाद, समन्वित कार्यप्रणाली और जिम्मेदारियों की स्पष्ट समझ अत्यंत आवश्यक है। किसी भी आपदा की स्थिति में विभागों के कार्यों में दोहराव न हो और संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित हो, इसके लिए पूर्व निर्धारित भूमिकाओं और जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण जरूरी है।

प्रशिक्षण में इन विषयों पर होगा विशेष फोकस

अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (प्रशासन) प्रकाश चंद्र ने प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि दो दिवसीय कार्यशाला के दौरान पूर्व चेतावनी प्रणाली (अर्ली वार्निंग सिस्टम), चेतावनियों का अंतिम छोर तक प्रभावी प्रसार, जोखिम मूल्यांकन, बाढ़ प्रबंधन, शहरी बाढ़ की चुनौतियां, संवेदनशील समुदायों की सुरक्षा, इंसिडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम, निकासी योजना, स्वास्थ्य क्षेत्र की तैयारी, जलवायु परिवर्तन जनित जोखिम, उभरती तकनीकों का उपयोग, बहु-एजेंसी समन्वय, त्वरित क्षति आकलन तथा पोस्ट डिजास्टर नीड्स असेसमेंट जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत व्याख्यान एवं चर्चा की जाएगी।

अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (क्रियान्वयन) एवं डीआईजी राजकुमार नेगी ने बताया कि मानसून अवधि को देखते हुए यूएसडीएमए राज्य के सभी जनपदों और रेखीय विभागों के साथ निरंतर समन्वय बनाए हुए है। राज्य, जनपद और तहसील स्तर पर नियमित समीक्षा बैठकें आयोजित की जा रही हैं तथा संवेदनशील क्षेत्रों की विशेष निगरानी की जा रही है।

संवेदनशील क्षेत्रों को बनाया जाए ‘नो सेल्फी जोन’

कार्यक्रम के दौरान सचिव विनोद कुमार सुमन ने नदी-नालों, झरनों, गहरी खाइयों तथा अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में रील और सेल्फी बनाने के बढ़ते चलन पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता हासिल करने की होड़ में लोग अपनी सुरक्षा को नजरअंदाज कर रहे हैं, जिससे दुर्घटनाओं की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

उन्होंने सभी जिलों को ऐसे संवेदनशील और दुर्घटना संभावित स्थलों की पहचान कर उन्हें “नो सेल्फी जोन” घोषित करने के निर्देश दिए। साथ ही इन स्थानों पर चेतावनी बोर्ड, बैरिकेडिंग और अन्य आवश्यक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने को कहा। उन्होंने सुझाव दिया कि सुरक्षित पर्यटन स्थलों को “सेल्फी सेफ जोन” के रूप में भी विकसित किया जाए, ताकि लोग प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते हुए सुरक्षित वातावरण में फोटो और वीडियो बना सकें।

अर्ली वार्निंग सिस्टम से कम होगी जनहानि

एनआईडीएम के प्रोफेसर डॉ. नवनीत कुमार ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे जोखिम पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है। उन्होंने प्रतिभागियों को सैटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक की उपयोगिता से अवगत कराते हुए बताया कि इसके माध्यम से दूरस्थ एवं दुर्गम क्षेत्रों की जानकारी प्रभावी ढंग से प्राप्त की जा सकती है।

उन्होंने अर्ली वार्निंग सिस्टम की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समय पर प्राप्त चेतावनियां जनहानि और संपत्ति के नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती हैं। उन्होंने प्रतिभागियों को ‘सचेत’ ऐप, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) द्वारा उपलब्ध कराई जा रही रियल टाइम मौसम संबंधी सेवाओं तथा ‘दामिनी’ ऐप के उपयोग के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी।

यूएलएमएमसी के निदेशक डॉ. शांतनु सरकार ने भूस्खलन न्यूनीकरण के लिए किए जा रहे राष्ट्रीय प्रयासों की जानकारी देते हुए कहा कि विभिन्न वैज्ञानिक संस्थान भूस्खलन पूर्वानुमान प्रणाली विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं और निकट भविष्य में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने की उम्मीद है।

कार्यक्रम में सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन, एससीईओ प्रशासन प्रकाश चंद्र, एसीईओ क्रियान्वयन डीआईजी राजकुमार नेगी, एनआईडीएम के प्रो. नवनीत कुमार, जेसीईओ मोहम्मद ओबैदुल्लाह अंसारी, असिस्टेंट प्रोफेसर रोहित कुमार, डॉ. शांतनु सरकार सहित सेना, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, पुलिस तथा अन्य विभागों के अधिकारी एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे।