Vice President C. P. Radhakrishnan का वन सेवा प्रशिक्षुओं को संदेश: विकास और संरक्षण में संतुलन जरूरी

0
8

VP Radhakrishnan: Development and Conservation Can Go Together

विकास और संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, सदैव साथ-साथ चल सकते हैं: उपराष्ट्रपति

आधुनिक वैज्ञानिक वानिकी और भारत के सभ्यतागत ज्ञान के समन्वय से बनेगा सतत भविष्य

देहरादून, 19 अगस्त 2026। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने बुधवार को देहरादून स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (IGNFA) में भारतीय वन सेवा (IFS) के 2025-2027 बैच के परिवीक्षार्थियों तथा प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे रॉयल भूटान वन सेवा के अधिकारियों को संबोधित किया। उन्होंने प्रशिक्षु अधिकारियों से वन, वन्यजीव, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ विकास की आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का आह्वान किया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि विकास और संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। आने वाले महत्वपूर्ण दशकों में प्रशिक्षु अधिकारी भारत के वनों, वन्यजीवों, जैव विविधता और बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालेंगे। उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत@2047’ के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारतीय वन सेवा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।

पारिस्थितिक सुरक्षा और नेट-जीरो लक्ष्य में वन सेवा की अहम भूमिका

सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि देश की पारिस्थितिक सुरक्षा को मजबूत करने और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन (Net Zero) के लक्ष्य को प्राप्त करने में वन सेवा का महत्वपूर्ण योगदान रहेगा। उन्होंने अधिकारियों से संरक्षण और विकास, पारिस्थितिक सुरक्षा और आजीविका तथा वर्तमान जरूरतों और भावी पीढ़ियों के हितों के बीच संतुलित दृष्टिकोण अपनाने को कहा।

उन्होंने कहा कि वन संरक्षण केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह जल सुरक्षा, जैव विविधता, जलवायु संतुलन, आजीविका और मानव जीवन की सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा हुआ है।

टीम की उत्कृष्टता को व्यक्तिगत सफलता से अधिक महत्व दें

उपराष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों को व्यक्तिगत उपलब्धियों के बजाय टीम की उत्कृष्टता को प्राथमिकता देने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि निरंतर सामूहिक प्रयास ही मजबूत संस्थानों और राष्ट्रों का निर्माण करते हैं।

उन्होंने वन क्षेत्रों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों के साथ पीढ़ियों से सामंजस्य बनाकर रहने वाले स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का सम्मान करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन समुदायों के पास प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और उनके सतत उपयोग से जुड़ा बहुमूल्य अनुभव है, जिसे आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

कठिन निर्णयों में संविधान, कानून, विज्ञान और जनहित बने मार्गदर्शक

लोक सेवा में सत्यनिष्ठा के महत्व को रेखांकित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि सत्यनिष्ठा से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने अधिकारियों से कठिन एवं चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में संविधान, कानून, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और व्यापक जनहित को निर्णय का आधार बनाने का आह्वान किया।

उन्होंने अधिकारियों को स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए देशभर में अपनाई जा रही सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को सीखने और उन्हें परिस्थितियों के अनुरूप लागू करने के लिए भी प्रोत्साहित किया।

वानिकी में आधुनिक तकनीक का विवेकपूर्ण इस्तेमाल जरूरी

उपराष्ट्रपति ने कहा कि बदलते समय के साथ वानिकी के क्षेत्र में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। उन्होंने नई पीढ़ी के वन अधिकारियों से रिमोट सेंसिंग, GIS, ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा आधारित प्रणालियों का उपयोग क्षेत्रीय अनुभव, विवेकपूर्ण निर्णय क्षमता और लोगों के प्रति संवेदनशीलता के साथ करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि तकनीक निर्णय लेने में सहायता कर सकती है, लेकिन प्रभावी वन प्रबंधन के लिए मैदानी अनुभव, मानवीय संवेदनशीलता और स्थानीय परिस्थितियों की समझ भी उतनी ही आवश्यक है।

वैज्ञानिक वानिकी और सभ्यतागत ज्ञान का हो समन्वय

सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि भारत के सतत भविष्य के निर्माण के लिए आधुनिक वैज्ञानिक वानिकी और भारत के सभ्यतागत ज्ञान को एक-दूसरे का पूरक बनाना होगा। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन परंपराओं में प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके साथ संतुलित जीवन का व्यापक दृष्टिकोण रहा है। आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से वन एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को और प्रभावी बनाया जा सकता है।

वन सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी उत्साहजनक

उपराष्ट्रपति ने वन सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बदलाव बताया। उन्होंने कहा कि वर्तमान बैच में लगभग 17 प्रतिशत महिलाएं हैं, जो नारी शक्ति की बढ़ती भागीदारी और सार्वजनिक सेवाओं में महिलाओं की सक्रिय भूमिका का उत्साहजनक उदाहरण है।

पद नहीं, संरक्षण और समाज के विश्वास से मापें करियर की सफलता

प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें अपने करियर की सफलता का आकलन केवल उनके द्वारा धारण किए गए पदों या प्राप्त प्रशासनिक उपलब्धियों से नहीं करना चाहिए। इसके बजाय उन्हें यह देखना चाहिए कि उन्होंने कितने वन पुनर्स्थापित किए, कितने वन्यजीवों और जैव विविधता का संरक्षण किया, कितने समुदायों का विश्वास अर्जित किया और भावी पीढ़ियों के लिए कैसी विरासत छोड़ी।

उन्होंने अधिकारियों से राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का आह्वान करते हुए कहा—“राष्ट्र प्रथम।”

इस अवसर पर उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त), मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, आईजीएनएफए के निदेशक डॉ. राजेंद्र प्रसाद, कोर्स निदेशक अजीता लोंगजाम सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।