Glacier Lake Disaster Preparedness: ग्लेशियर झीलों पर बढ़ेगी निगरानी, उत्तराखंड में अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम होंगे स्थापित

0
7

Uttarakhand to Install Advanced Glacier Lake Early Warning Systems

ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए स्थापित होंगे अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम, जोखिम न्यूनीकरण पर रहेगा फोकस

 

 

देहरादून। उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरों को देखते हुए राज्य सरकार ने उनकी निगरानी, पूर्व चेतावनी और आपदा प्रबंधन व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की नियमित एवं वैज्ञानिक निगरानी के साथ-साथ अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने और आवश्यकता के अनुसार मौजूदा व्यवस्थाओं का विस्तार करने के निर्देश दिए हैं।

मुख्यमंत्री ने सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन को निर्देश दिए कि प्रदेश में चिन्हित संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का व्यापक सर्वेक्षण एवं वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए। इसके अंतर्गत झीलों के जलस्तर, आकार में होने वाले बदलाव, आसपास के भू-भाग की स्थिति, संभावित जोखिम कारकों तथा डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का नियमित आकलन किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि केवल खतरे की निगरानी पर्याप्त नहीं है, बल्कि संभावित आपदा के प्रभाव को न्यूनतम करने के लिए पहले से प्रभावी व्यवस्थाएं विकसित करना जरूरी है। इसके लिए आधुनिक सेंसर, जलस्तर मापक उपकरण, रियल टाइम डेटा प्रणाली, संचार नेटवर्क तथा अन्य तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

चेतावनी से लेकर राहत-बचाव तक मजबूत होगी पूरी व्यवस्था

मुख्यमंत्री ने संवेदनशील क्षेत्रों में संभावित आपदा की स्थिति में सुरक्षित निकासी मार्गों की पहचान, संभावित प्रभावित क्षेत्रों का चिन्हांकन, वैकल्पिक संचार व्यवस्था, स्थानीय चेतावनी तंत्र तथा राहत एवं बचाव की तैयारियों को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया है।

इसी क्रम में मुख्यमंत्री के निर्देश पर उपाध्यक्ष, राज्य सलाहकार समिति, आपदा प्रबंधन विभाग विनय रुहेला तथा ले. कर्नल रघुवीर सिंह भण्डारी (सेवानिवृत्त) ने नेपाल में हाल में घटित आपदा के बाद उत्तराखण्ड में ऐसी संभावित आपदाओं से निपटने की तैयारियों की समीक्षा की। बैठक में सभी जिलाधिकारियों के साथ ग्लेशियर झीलों, नदियों के जलस्तर, संवेदनशील स्थलों, अर्ली वार्निंग सिस्टम, संचार व्यवस्था, त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र और स्थानीय संसाधनों की उपलब्धता पर चर्चा की गई।

जिलाधिकारियों को अपने-अपने जनपदों में संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की नियमित निगरानी सुनिश्चित करने तथा किसी भी असामान्य गतिविधि या स्थिति की सूचना तत्काल उच्च स्तर पर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए।

उत्तराखण्ड में 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलें चिन्हित

सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने बताया कि उत्तराखण्ड में कुल 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इनमें से चार ग्लेशियर झीलों का सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है। शेष संवेदनशील झीलों का भी चरणबद्ध तरीके से सर्वेक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाएगा।

उन्होंने बताया कि जल्द ही चमोली जनपद स्थित सरस्वती ताल और उत्तरकाशी जनपद स्थित केदारताल के सर्वेक्षण के लिए विशेषज्ञ दल रवाना किया जाएगा। सर्वेक्षण के दौरान झीलों की मौजूदा स्थिति, जलस्तर, संभावित खतरे के कारकों और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में संभावित प्रभाव का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा।

रियल टाइम निगरानी और आधुनिक सेंसर पर जोर

सचिव सुमन ने कहा कि ग्लेशियर झीलों की निगरानी को केवल सर्वेक्षण तक सीमित नहीं रखा जाएगा। संवेदनशील झीलों में निरंतर निगरानी की व्यवस्था विकसित की जाएगी और आवश्यकता के अनुसार अत्याधुनिक सेंसर तथा अर्ली वार्निंग उपकरणों की संख्या बढ़ाई जाएगी।

उन्होंने बताया कि रियल टाइम डेटा प्राप्त करने की व्यवस्था, चेतावनी प्रसारित करने के लिए वैकल्पिक संचार माध्यम तथा स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत किया जा रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को संभावित खतरों और आपदा के दौरान अपनाई जाने वाली सुरक्षित प्रक्रियाओं के प्रति जागरूक करने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा।

नदियों और डैम-बैराज के जलस्तर की लगातार निगरानी

उपाध्यक्ष, राज्य सलाहकार समिति, आपदा प्रबंधन विभाग विनय रुहेला ने कहा कि उत्तराखण्ड और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों में कई समानताएं हैं। ऐसे में नेपाल में हुई आपदा से सीख लेते हुए उत्तराखण्ड में संभावित जोखिमों के प्रति पहले से तैयारी करना आवश्यक है।

उन्होंने प्रदेश में चिन्हित सभी संवेदनशील स्थलों की निरंतर निगरानी के निर्देश दिए। साथ ही डैम और बैराज के प्रबंधकों के साथ नियमित समन्वय एवं बैठकें करने पर जोर दिया गया। डैम से पानी छोड़े जाने की स्थिति में डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को समय रहते अलर्ट करने की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया।

स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन क्षमता बढ़ाने पर जोर

ले. कर्नल रघुवीर सिंह भण्डारी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि प्रत्येक आपदा अपने साथ महत्वपूर्ण सीख लेकर आती है। नेपाल में घटित त्रासदी से सीख लेते हुए उत्तराखण्ड में संभावित आपदाओं के लिए तैयारियों को और अधिक प्रभावी बनाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि आपदा की स्थिति में स्थानीय स्तर पर मौजूद लोग और प्रशासन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए ग्राम प्रधानों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच मजबूत एवं त्वरित संचार नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी आपात स्थिति में चेतावनी और आवश्यक जानकारी सबसे पहले संभावित प्रभावित आबादी तक पहुंच सके।

बैठक में एसीईओ प्रशासन प्रकाश चंद्र, एसीईओ क्रियान्वयन डीआईजी राजकुमार नेगी, जेसीईओ दिनेश कुमार पुनेठा सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।

राज्य सरकार का जोर अब केवल आपदा की निगरानी तक सीमित रहने के बजाय पूर्व चेतावनी, जोखिम न्यूनीकरण, स्थानीय क्षमता निर्माण और त्वरित राहत-बचाव की पूरी व्यवस्था को एकीकृत रूप से मजबूत करने पर है।